मंगलवार, 15 अगस्त 2017

मन भयमुक्त हो जहां

मन भयमुक्त हो जहां
और मस्तक ऊंचा

ज्ञान जहां मुक्त हो;

और जहां दुनिया को

संकीर्ण घरेलू दीवारों से

छोटे छोटे टुकड़ों में बांटा नहीं गया है;

जहां शब्द सच की गहराइयों से निकलते हैं;

जहां थकी हुई प्रयासरत बांहें

त्रुटि हीनता की तलाश में हैं;

जहां कारण की स्पष्ट धारा है

जो सुनसान रेतीले मृत आदत के

वीराने में अपना रास्ता खो नहीं चुकी है;

जहां मन हमेशा  व्यापक होते विचार और सक्रियता में

तुम्हारे जरिए आगे चलता है

और आजादी के स्वर्ग में पहुंच जाता है

ओ पिता

मेरे देश को ऐसा जागृत बनाओ”

रविवार, 23 जुलाई 2017

झूठ का स्वर्णकाल

1949  में लिखी गयी  जॉर्ज ऑरवेल की किताब नाइन्टीन  एटी  फोर  सुव्यवस्थित तरीके से झूठ के प्रचार के तौर तरीकों के बारे में विस्तार से पूर्वाभास करती है।  
ऑरवेल ने एक दुनिया की कल्पना  की थी   जहां दुनिया तीन बड़े राष्ट्रों में बँट  चुकी है , तीनों महा-राष्ट्र बंद समाज हैं।  इन महा-राष्ट्रों  का नेतृत्व जनता को अतिराष्ट्रवाद की खुराक के सहारे अपने नियंत्रण में रखे हुए है.  व्यक्ति , उसके  रिश्ते , उसका जीवन यहां तक कि  उसका अस्तित्व और अतीत भी राष्ट्रवाद की भेंट चढ़ चुका है और राज्य के सख्त पहरे में है. 
यहां अतीत की बात इसलिए महत्वपूर्ण  हो जाती है क्योकि व्यक्ति ख़त्म होने के बाद लोगों की स्मृतियों में रहते हैं विचार दबा भी दिए जाएँ तो कोने में पड़े रहते हैं और मौक़ा मिलने पर उभर आते हैं।  एक समझदार तानाशाह के लिए ये जरुरी होता है कि  वो लोगों की सोच ,समझ और विश्वासों पर शासन करे. अपनी पुस्तक द राज सिंड्रोम में सुहास चक्रवर्ती ब्रिटिश राज के तौर -तरीकों के बारे में जो कुछ बताते हैं वो दुनिया के हर राज का सच है. . 
नाइन्टीन एटी फोर पढ़ते समय हमें महसूस होता था कि यह सब कुछ सिर्फ बंद समाजों में ही चल सकता है. प्रचारकों के सहारे कैसे झूठ फैलाया और सच बनाया जाता है ये हमने देख रखा हुआ था. विद्यार्थी के रूप में हम देख चुके थे कि कैसे शुरुआत से ही मस्तिष्कों को अपने वश में करने की कोशिशें की जाती हैं. समर्पित कार्यकर्ता जो  कि समाज के संपन्न  तबके के लोग होते थे कैसे  रात के अंधेरों में धार्मिक उन्माद फैलाने वाले वीडियोज  के गुप्-चुप प्रदर्शन का बंदोबस्त करते थे ये किसी से छुपा हुआ नहीं है।  लेकिन ये सब बंद समाजों में ही संभव था ,
सूचना क्रान्ति और शिक्षा के विकास के बाद झूठ के प्रचारकों के लिए सबसे बड़ी समस्या आयी कि जानकारी के सर्वसुलभ हो जाने के बाद , ज्ञान के सर्वसुलभ हो जाने के बाद लगातार बेड़ियाँ तोड़ रहे समाज को वापस कैसे कैद किया जाय।  इंडिया शाइनिंग के आश्वस्त कर देने वाले प्रचार के झांसे में न पड़ने वाले समाज को कैसे बंद किया जाय. इंटरनेट ने तो हर मुँह को जुबान दे दी थी और हर मस्तिष्क को सोच का दायरा बढ़ाने का मौक़ा दे दिया था. 
यहां पर इन्होने अपनी रणनीति बदली. वास्तविक न सही आभासी बंधन बनाने की।  राष्टवाद और सूचना तकनीकि को साथ मिला कर एक मजबूत दीवार तैयार की गयी. इंटरनेट पर न्यूज़ वेबसाइटों का जाल , दृश्य श्रव्य माध्यमों पर कब्जा, फेसबुक /टविटर पर उपयोगकर्ताओं का जाल और मोबाईल फ़ोन पर व्हाट्सएप  ग्रुपों का जाल. . . अब लोगों को देखने , सुनने और पढ़ने के लिए चारों तरफ सिर्फ यही लोग मौजूद हैं।  मेरे पास दिन कम से कम दस वाट्सएप ऐसे ही लक्षित मैसेज आते हैं कभी कभी तो एक ही मैसेज दस दस बार. किसी व्यक्ति के पास जो सूचनाएं पहुँचती हैं उसकी सोच वैसे ही होती  जाती है. हर आदमी तो हर एक चीज क्रॉसचेक नहीं कर सकता है. 
इस घेराबंदी के बाद अब नाइन्टीन एटी  फोर  कल्पना नहीं रह गयी है. हमारा समाज हमें हर दिन उसी कृत्रिम उन्माद और गुलामी की और बढ़ता नजर आता है जिसकी कल्पना जॉर्ज ऑरवेल ने की थी. 

अभी कुछ दिन पहले रवीश कुमार ने फेक न्यूज़ पर एक स्टोरी करते हुए एक सवाल उठाया था कि आखिर जवाहर लाल नेहरू जिनके 2019 प्रधानमंत्री बनने की ज़रा भी संभावना नहीं है उनके ऊपर कीचड क्यों उछाला जा रहा है वो भी प्रधानमंत्री कार्यालय तक के आई पी से।  

जवाहर लाल नेहरू पर कीचड संघ  के अस्तित्व में आने के बाद से ही उछाला जा रहा है।  अभी इसमें तेजी की वजह वही पुरानी सोच है. किसी को ख़त्म करना है तो अतीत में जा के ख़त्म करो और आज उनके पास अधिक कारगर हथियार हैं।  

नन्हा किसान


सोमवार, 26 जून 2017

आपातकाल

हिंसक भीड़ द्वारा संचालित
शासनतंत्र में जीते हम,
आपातकाल के बाद की  पीढ़ी के लोग  

हैरान होते हैं आज
कि लोकतंत्र,
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और
विचारों की आज़ादी
को बेड़ियां पहनाने की
कोशिशें तब अनुचित मानी जाती थीं 

रविवार, 11 जून 2017

कृषक अशांति

एक मत के अनुसार 1857 के विद्रोह के लिए जिम्मेदार कारणों में एक कारण कृषकों की बदहाली भी थी आखिर सैनिक सैनिक होने के पहले किसान ही थे सैनिक होते हुए भी किसान थे और सैनिक न रहने की बाद भी किसान ही रहने वाले थे। वर्दी पहन लेने भर से वे अपने समाज से अपनी नियति से और अपने आप से कट जाने वाले नहीं थे।
हम सभी जिनका किसी गाँव से कोई भी सम्बन्ध होता है कुछ होने न होने के साथ किसान भी होते हैं और किसानों को प्रभावित करने वाली हर चीज हमें प्रभावित करती है वर्दी पहने या जीन्स, खेती करें या नौकरी, अपने नाम पर जमीन हो या न हो
फोटो रेजीडेंसी लखनऊ की है जो दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य के विरुध्द उन्ही वर्दी पहने किसानों के सबसे प्रचंड विद्रोह का एक मजबूत गवाह है। संयोग से फोटो रेजीडेंसी के चर्चयार्ड की है।

शुक्रवार, 5 मई 2017

लोकपाल षड़यंत्र और गैंग अन्ना

2009 के लोकसभा चुनावों के परिणामों ने बहुत स्पष्ट तरीके से बताया कि भारत के लोग किस दिशा में सोच रहे हैं।
2008 के मुम्बई आतंकी हमले से निपटने के सरकार के तौर तरीकों,
सामाजिक आर्थिक मजबूती करण की योजनाओं
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत के बढ़ते प्रभाव और आर्थिक मंदी के सामने मजबूती से खड़ी भारतीय अर्थव्यवस्था को देख और समझ रहे मतदाताओं ने सकारात्मक मतदान करते हुए कांग्रेस के तौर तरीकों के प्रति सहमति व्यक्त की थी। इन चुनावों के परिणामों में कुछ चीजें बड़े स्पष्ट तरीके से देखी जा सकती थीं।
जैसे शहरी मतदाताओं विशेषकर मध्यवर्ग का कांग्रेस के प्रति सकारात्मक रुझान और ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस की वापसी
उत्तर प्रदेश में जहाँ कांग्रेस लुप्तप्राय हो चली थी कांग्रेस की दमदार वापसी हुई थी ।
लोगों ने लाउड लौह पुरुषों को नकार कर मितभाषी सिख को चुना था।
इसके बावजूद कांग्रेस का एक कमजोर पक्ष था
भ्रष्टाचार!
भ्रष्टाचार का दाग कांग्रेस के लिए हमेशा से भारी पड़ता रहा है और यही वह हथियार था जिससे कांग्रेस के प्रति बढ़ती सकारात्मकता को नकारात्मकता में बदला जा सकता था।
सत्तापरिवर्तन के लिए बेकरार लॉबी ने सैनिक चुने
राजनैतिक उद्देश्य के लिए अराजनैतिक चेहरे

 अराजनैतिक चेहरों के मुख्य समूह ने विश्वसनीय माने जाने वाले भ्रष्टाचार के विरोधी सामजिक कार्यकर्ताओं को साथ मिलाया। इस समूह को हमने गैंग अन्ना का नाम दिया था।
और 2010 के अंत में जब निर्भया प्रकरण के बाद इस जनांदोलन मिसाइल का टेस्टफायर चल रहा था तब एक दिन किरण बेदी के नाम से भेजा एक sms मोबाइल में पहुंचा लोकपाल के लिए प्रस्तावित संघर्ष का आह्वाहन।
धीरे-धीरे कई नाम सामने आये योगेंद्र यादव, अरुणा राय ,जस्टिस हेगड़े जैसे कुछ नामों को छोड़ कर बाकी नामों पर हमें कभी भरोसा नहीं रहा था। इन नामों पर भरोसे के बावजूद इस संघर्ष में हमें छिपी साजिश नज़र आ रही थी।
हमें एक संगठन विशेष की छाप हर जगह नजर आ रही थी। वो संगठन जिसका प्रचार तंत्र काफी मजबूत रहा है और अभी 2009 में मुंह की खा चुका था। जिसकी भारत के बाहर बसे भारतीयों में और शहरी मध्यवर्ग में अच्छी पकड़ थी।
संघर्ष तेज हुआ
जैसे अभी नहीं तो कभी नहीं अब तो लोकपाल ले कर ही मानेंगे
सरकार का राजनैतिक नेतृत्व संघर्ष के रिस्पॉन्स में प्रभावी नहीं था। सत्तापक्ष की सबसे मजबूत नेता, जिसने बाजपेयी, महाजन, आडवाणी जैसे धुरंधरों को रणनीतिक रूप से धूल चटाई थी और करात जैसे हठधर्मियों को आइना दिखाया था , अस्वस्थता के चलते राजनैतिक रूप से निष्क्रिय थी। सत्तापक्ष समझ नहीं पा रहा था कि इसे राजनैतिक माने या अराजनैतिक और इसका प्रतिकार कैसे करें। याद करें भूख हड़ताल शुरू करने  दिल्ली आये एक योग शिक्षक से मिलने सरकार ने अपने वरिष्ठ मंत्री भेजे
याद करें गैंग के सदस्यों को देश की आमजनता का प्रतिनिधि मानते हुए लोकपाल पर अंतिम निर्णय के लिए एक समिति बनाई गयी जिसमें गैंग अन्ना के और सरकार के सदस्यों की बराबर की भागेदारी थी परंतु सरकार से इतर जनप्रतिनिधियों की कोई गणना नहीं थी। प्रमुख विपक्षी दल ने इसका विरोध तक नही किया( शायद गैंग अन्ना के सदस्य अंततः उसी के प्रतिनिधि थे और वह छद्म लड़ाई लड़ रहा था)
सरकार के प्रतिकार के तौर तरीकों में अपरिपक्वता और अनिर्णय स्पष्ट नज़र आ रहा था। यह संसदीय लोकतंत्र की अवहेलना थी। गैर भाजपा दलों ने सरकार के इन तौर तरीकों विरोध भी किया। परंतु दक्ष प्रशासकों के समूह ने गंभीर राजनैतिक गलतियां कीं
मुफ़ीद समय
मुफ़ीद तरीका
मुफ़ीद हथियार
जब धीरे धीरे वे लोग जिनपर हमें भरोसा था आंदोलन से अलग होने लगे तो हमें यकीन हो गया कि हमारा जजमेंट इस आंदोलन को लेकर सही था।
2013 आते-आते दिल्ली की सबसे प्रभावी और सफल मुख्यमंत्री की बलि लेकर इस आंदोलन ने 2014 की दशा और दिशा स्पष्ट कर दी। 
 आज उस गैंग के लोग अलग अलग जगहों पर सत्ता में बैठे हैं
जिन घोटालों पर जन मानस रोष में था आज वे कहाँ हैं
-निर्भया सी घटनाओं पर अब कोई समूह प्रतिक्रिया नहीं होती
- कलमाड़ी , राजा आदि लोग जो मनमोहन सरकार में जेल गए थे आज मोदी सरकार में कहाँ हैं।
- शरद पवार पद्म सम्मान पा रहे हैं
- रविशंकर (गैंग और उसके प्रायोजक दोनों इनके भक्त हैं) यमुना प्रदूषित करते हुए लोगों को जीने के तरीके सीखा रहे हैं।
- जो तुरंत काला धन वापस मंगवाने के लिए आमरण अनशन कर रहा था वो सरकारी सहयोग से अकूत सम्पदा जुटाने में लगा है
- दूसरे गांधी प्रहसन में अपना किरदार अदा करके वापस जा चुके हैं
मामला भ्रष्टाचार से हट के हिन्दू-मुस्लिम  पे जा चुका है
लोकपाल का तो शुरू से ही कोई इरादा नहीं था
इसे हिंदुस्तान के इतिहास में लोकपाल षडयंत्र के नाम से जाना जाएगा


मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

युद्धोन्मादी समाज में शान्ति की वकालत


बॉर्डर फिल्म के अंत में एक गाना था "मेरे दुश्मन , मेरे भाई"
युद्ध पर बनी इस फिल्म में ये गाना युद्ध की खिलाफत करता हुआ शान्ति की वकालत करता है। उस समय देश देशभक्ति को लेकर इतना संवेदनशील नहीं हुआ था   नहीं तो लोग इस गाने के रचयिता, गायक और फिल्म के निर्माताओं का विरोध करते, अपनी (घृणित) मानसिकताओं का प्रदर्शन करते।  उस समय  लोग इस फिल्म को देखने को ही देशभक्ति मानते थे. 

देश के एक प्रधानमंत्री  बस  जिसे सदा-ए -सरहद का  नाम दिया था उसे लेकर पाकिस्तान गए।  उद्देश्य था जंग के खिलाफ एक मज़बूत  पहल , शान्ति  की वकालत।  शायद लोग जानते नहीं थे  कि   पाकिस्तान  इस देश का दुश्मन है  नहीं तो प्रधानमंत्री  जी लाहौर  चले  तो गए थे पर वापस नहीं आ पाते।  


एक और देशभक्त प्रधानमंत्री अभी कुछ दिनों  अचानक शान्ति और प्रेम की पहल  के साथ  पकिस्तान पहुँच गए।  शायद वे प्रधानमंत्री थे एक मामूली छात्र नही । बड़े लोग कुछ भी कर सकते हैं कभी शांति की वकालत कभी युद्ध का उद्घोष । तोहफों की अदला-बदली या सीमाओं पर गोलियों की अदलाबदली । हमें तो बस वे जो कहें उसे करते जाना है । जब जंग कहें तो सीना तान कर सीमा पर खड़े हो जाना और अपने सगे संबंधियों की मौत को शहादत कह कर गर्व करना और जब शांति कहें तो फूल माला लेकर हुक्मरानों के मेहमानों का स्वागत करने  पहुँच जाना हैं । 
अभी कुछ दिन पहले संसद में एक  निजी विधेयक पर सरकार ने बताया कि पाकिस्तान को आतंकी राष्ट्र घोषित नही किया जा सकता ।  गृह मंत्रालय ने इस विधेयक को लेकर अपने विरोध के बारे में राज्य सभा सचिवालय को सूचित कर दिया है. मंत्रालय ने कहा कि ऐसा कदम अंतरराष्ट्रीय संबंधों में 'बाधा' डालने वाले हैं। सरकार तो सरकार होती है उसे कोई कुछ क्यों कहेगा 
हम आवाम हैं हुक्मरान नही ये बात एक बच्ची भूल गई । कोई बीस साल की एक बच्ची ये समझने में तो कामयाब हो गई की उसके पिता की मौत की ज़िम्मेदारी उस सदा चलने वाले युद्ध की है जिसका शिकार अभी और भी न जाने कितने मासूमों को होना है वो यह तो समझ गयी कि युद्ध का ये दौर खत्म हुए बिना देश का हर परिवार अपने सगे संबंधियों को खोने के लिए अभिशप्त है लेकिन वो ये नही समझ सकी कि देशभक्ति के इस दौर में शांति की वकालत आम शहरियों को नही करनी है वो तो हुक्मरानों का डोमेन है। 


जिन घरों के लोग इस उन्माद की भेंट चढ़ते हैं उन्हे शायद कभी युद्ध पसंद न हो लेकिन वे लोग जिन्हें सीमा का "स" भी नही पता होता उनके अंदर देशप्रेम हिलोरें मार रहा होता है। वे युद्धोन्माद के गीत रचते हैं , शहीदों पर गर्व करते हुए सीना तान कर देशभक्ति के नारे गढ़ते हैं और पीठ फिरते ही उनही शहीदों के बच्चों को उनकी औकात बताने लग जाते हैं कि तुम सिर्फ शहादत के लिए हो खुद को अभिव्यक्त करने के लिए नही। 
गुरुमेहर कौर इन प्लेकार्ड्स ने और इसपर आई प्रतिक्रियाओं ने काफी कुछ ऐसा प्रकट किया है जिसे हम सभी को समझने की जरूरत है। तुम से बच्चे हर समाज के लिए  रौशनी की किरण होते हैं। 
अंत में 
प्रिय सरकार ,
सोशल मीडिया पर सदा सर्वदा मौजूद रहने के बाद भी क्या आपके किसी भी सदस्य को कभी यह महसूस नही हुआ कि एक बच्ची की का ये वीडियो देशप्रेम , शांति और समझ की वकालत कर रहा है । क्या आपको कभी ये नही लगा कि ये बच्ची वही कह रही है जो सरकारें अक्सर कहती हैं । 
चलिये  नही लगा तो नही सही पर क्या आपको कभी नही लगा कि इसपर आने वाली कुत्सित प्रतिक्रियाएँ भर्त्सना के लायक हैं? 
नही लगा तो आप नुमाइंदे नही शासक हैं 
-आपकी आवाम 

शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

आजादी

सीखना है चुप रहना 
या जारी रखनी है आवाज उठाने की आजादी 

सीखना है सर झुका के रखना 
या जारी रखनी है सर उठा के जीने की आजादी 

सीखना है रेंगना 
या जारी रखनी है कुलांचे भरने  की आजादी 

सीखना है दिमाग बंद रखना 
या जारी रखनी है सोचने  की आजादी

भविष्य का फैसला है आज पर टिका है



रविवार, 2 अक्तूबर 2016

तल्लीन


कार्यक्षेत्र में तल्लीन एक कीट
शाम के कोई पांच बजे
स्थान इंदिरा वानस्पतिक उद्यान, रायबरेली

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